हरिद्वार
भूपतवाला स्थित स्वामी तुरीयानन्द सत्संग सेवा आश्रम में ब्रह्मलीन श्री श्री 1008 स्वामी तुरीयानन्द जी महाराज का 55वाँ निर्वाण दिवस महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। गद्दीनशीन श्री श्री 1008 स्वामी विवेकानन्द गिरि जी महाराज के सान्निध्य में आयोजित इस भव्य संत सम्मेलन में देशभर से पहुंचे संत-महात्माओं और विशाल संगत ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत कर दिया।
कार्यक्रम का आयोजन स्वामी तुरीयानन्द ट्रस्ट (रजि०) द्वारा किया गया, जिसमें दूर-दराज़ से आई संगत ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। संतों के ओजस्वी प्रवचनों ने श्रद्धालुओं पर धर्म की अमृत वर्षा कर उन्हें भाव-विभोर कर दिया।
गद्दीनशीन महाराज श्री ने अपने प्रेरक उद्बोधन में ‘सतगुरू की महिमा’ को एक सरल उदाहरण से समझाया। उन्होंने कहा कि जैसे एक साधारण तांबे का तार बेकार प्रतीत होता है, लेकिन जब वही तार विद्युत धारा से जुड़ता है तो अपार शक्ति का स्रोत बन जाता है—ठीक उसी प्रकार, माया में उलझा जीव जब सतगुरू से जुड़ता है, तो उसमें भी दिव्य शक्ति और अनन्त भक्ति का संचार हो जाता है।
उन्होंने रामचरितमानस के अयोध्या काण्ड का उल्लेख करते हुए कहा—
“गुरु बिन भव निधि तरइ न कोई
अर्थात गुरु के बिना इस संसार रूपी सागर से पार पाना असंभव है।
इस अवसर पर हरिद्वार के अनेक महामंडलेश्वर एवं प्रतिष्ठित संतों ने अपने आशीर्वचन देकर संगत को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने का संदेश दिया। कार्यक्रम के अंत में गद्दीनशीन महाराज जी ने सभी संतों का अभिनंदन कर आभार प्रकट किया।
स्वामी तुरीयानन्द ट्रस्ट ने भी सभी संतों एवं श्रद्धालुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस विराट संत सम्मेलन में हरिद्वार के अनेक प्रमुख संत महापुरुषों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिससे पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से सराबोर हो उठा।


